आठवें विश्व हिंदी सम्मेलन में सम्मानित विद्वानों का परिचयः

विदेशी विद्वान

1. प्रो. मुमताज उस्मानोव (ताजिकस्तान)

प्रो. मुमताज उस्मानोव ताजिक स्टेट नेशनल विश्वविद्यालय में हिंदी और उर्दू विभाग के अध्यक्ष हैं । प्रो.मुमताज ने 40 वर्ष के अपने शैक्षिक जीवन में ताजिकस्तान में हिंदी भाषा और साहित्य के विकास में अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान दिया है उन्होंने 1967-68 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय तथा 1987-88 में जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय से हिंदी और उर्दू भाषा तथा साहित्य का अध्ययन किया । उन्होंने भारतीय भाषाओं, साहित्य, इतिहास तथा संस्कृति पर 80 से भी अधिक लेख लिखे हैं तथा अनेक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों और सेमिनारों में भाग लिया है । प्रो. मुमताज ताजिक स्टेट नेशनल विश्वविद्यालय के ओरिएंटल अध्ययन विभाग में 1968 से हिंदी और उर्दू भाषाओं का अध्यापन कर रहे हैं । भारतीय राजदूतावास अपने भारतीय सांस्कृतिक केन्द्र में उनकी सहायता से वर्ष 2003 से नःशुल्क हिंदी कक्षाएँ आयोजित कर रहा है । प्रो. मुमताज उस्मानोव इस शिक्षण कार्यक्रम के मुख्य समन्वयक हैं । 

2. डॉ. लुदमिला वी. खोखलोवा (रूस)

डॉ. लुदमिला वी. खोखलोवा मास्को स्टेट विश्वविद्यालय के एशियाई और अफ्रीकी अध्ययन संस्थान में भारतीय दर्शनशास्त्र विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर हैं । उन्होंने 1970 में मास्को स्टेट विश्वविद्यालय से हिंदी भाषा और साहित्य में एम.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की तथा 1974 में भाषा विज्ञान संस्थान, मास्को से भारतीय भाषा विज्ञान में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की । उन्होंने हिंदी तथा भारतीय भाषाओं और भारतीय संस्कृति पर रूसी तथा अंग्रेजी में अनेक लेख लिखे हैं । डॉ. खोखलोवा ने रूस में हिंदी भाषा और साहित्य के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है । डॉ. खोखलोवा को रूसी भाषा के अलावा अंग्रेज़ी, हिन्दी, उर्दू एवं पंजाबी भाषा में ज्ञान प्राप्त है ।

3. प्रो. हर्मन वैन ऑल्फन (संयुक्त राज्य अमरीका)

प्रो. हर्मन वैन ऑल्फन टैक्सास विश्वविद्यालय में एशियाई अध्ययन के प्रोफेसर हैं । प्रोफेसर ऑल्फन टैक्सास विश्वविद्यालय में सभी स्तरों पर हिंदी और उर्दू भाषा का अध्यापन कार्य करते हैं । वे एक समाजशास्त्री भी हैं और भाषा नियोजन का कार्य भी करते हैं । उनकी अनुसंधान परियोजनाओं में हिंदी और उर्दू व्याकरण शामिल है । वे भारतीय अध्ययन संबंधी अमरीकी संस्थान की भाषा समिति के अध्यक्ष हैं ।

4. डॉ. सुरेन्द्र गम्भीर (संयुक्त राज्य अमरीका)

डॉ. सुरेन्द्र गम्भीर पेनसिलवेनिया विश्वविद्यालय में पैन इंडिया कार्यक्रम के निदेशक हैं । वे पेनसिलवेनिया विश्वविद्यालय में पिछले दो दशकों से दक्षिण एशियाई अध्ययन विभाग में हिंदी और भाषा शास्त्र के प्रोफेसर हैं । डॉ. गम्भीर भारत और भारतीय संस्कृति पर एक अच्छे लेखक और अच्छे वक्ता हैं । वे पेनसिलवेनिया विश्वविद्यद्यालय में भारत संबंधी कार्यक्रम को निर्देशित करते हैं । वे भारतीय अध्ययन संबंधी अमरीकी संस्थान की भाषा समिति के अध्यक्ष भी हैं । 

5. डॉ. एवा अरादि (हंगरी)

डॉ. एवा अरादि ने 1976 में भारतीय विद्या भवन, बम्बई से हिंदी में स्नातक की उपाधि तथा 1979 में बुडापेस्ट से हिंदी साहित्य में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की । डॉ. अरादि ने हिंदी साहित्य से संबंधित विविध विषयों पर अनेक लेख लिखे हैं तथा प्रेमचंद की कई कहानियों का हंगेरियन भाषा में अनुवाद भी किया है । उन्होंने हंगरी में हिंदी भाषा और साहित्य को एक नयी दिशा प्रदान की है और उनके प्रयासों के फलस्वरूप हंगरी में हिंदी भाषा के अध्ययन, अध्यापन एवं अनुसंधान को एक नई दिशा मिली है ।

6. डॉ. गेनादी शलौम्पेर (इजरायल)

डॉ. गेनादी शलौम्पेर ने 1977 में ताशकंद स्टेट विश्वविद्यालय से भारतीय दर्शनशास्त्र में एम.ए. किया तथा 2003 में जेरूसलम में हेब्रू विश्वविद्यालय से हिंदी भाषा विज्ञान में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की । डॉ. शलौम्पेर ने भारतीय दर्शन और हिंदी साहित्य पर अनेक महत्वपूण पुस्तके लिखी हैं तथा हिंदी की अनेक श्रेष्ठ रचनाकारों की उन्होंने पुस्तकों का रूसी भाषा में अनुवाद भी किया है । इजरायल में हिंदी भाषा और साहित्य के उत्थान में डॉ. शलौम्पेर ने अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है । 

7. डॉ. उल्फत मुखीबोवा (उज्बेकिस्तान)

डॉ. उल्फत मुखीबोवा ने ओरिएंटल अध्ययन संस्थान ताशकंद से हिंदी में एम.ए. करने के पश्चात डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की । भारतीय साहित्य और हिंदी भाषा पर डॉ. मुखीबोवा के अनेक लेख और पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं जिसमें भक्ति और सूफी साहित्य पर लिखी उनकी पुस्तके उल्लेखनीय हैं । उन्होंने उज्बेकिस्तान में हिंदी और उर्दू भाषाओं को समृद्ध बनाने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है । डॉ. मुखीबोवा अनेक सांस्कृतिक संगठनों से भी जुड़ी रही हैं । 

8. प्रो. जोगिन्दर सिंह कंवल (फिजी)

प्रो. जोगिंदर सिंह कंवल जनवरी, 1958 में भारत के पंजाब राज्य से फिजी आए । डॉ. कंवल फिजी में अनेक शैक्षिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक संगठनों से जुड़े रहे हैं । उन्होंने फिजी में 1958 से 1991 तक के अनेक शैक्षणिक संस्थानों में अध्यापन का कार्य किया । इस दौरान, उन्होंने अनेक लेख लिखे जो विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं । आप 1993 से 2003 तक फिजी स्थित भारतीय सांस्कृतिक केंद्र के प्रशासक भी रहे हैं । डॉ. जोगिंदर सिंह कंवल ने हिंदी भाषा और भारतीय सांस्कृतिक के प्रचार-प्रसार में अपना महत्वूपर्ण योगदान दिया है । 

9. श्री अमित जोशी (नार्वे)

श्री अमित जोशी ने हिंदी में एम.ए. करने के पश्चात नार्वे में हिंदी भाषा और भारतीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार की दिशा में अनेक महत्वपूर्ण कार्य किए हैं । वे नार्वे से ही "शांति दूत " नामक पत्रिका का प्रकाशन कर रहे हैं जो विदेशों में हिंदी लेखन की एक प्रतिनिधि पत्रिका है । अमित जोशी ने नार्वे की श्रेष्ठ लोक कथाओं का हिंदी में अनुवाद किया तथा "कगार की आग ", "रामायण " आदि का नार्वेजियन भाषा में अनुवाद किया । वे अनेक सांस्कृतिक संगठनों से भी जुड़े रहे हैं ।

10. पंडित हरिदेव सहतू (सूरीनाम)

पंडित हरिदेव सहतू ने सूरीनाम में हिंदी के प्रचार-प्रसार में उल्लेखनीय योगदान दिया है । वे सूरीनाम हिंदी परिषद से निकट रूप से जुड़े रहे हैं । परिषद में अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने समूचे सूरीनाम में हिंदी के अध्ययन-अध्यापन के कार्य को आगे बढ़ाया और इनके प्रयासों के फलस्वरूप सूरीनाम में हिंदी भाषा काफी लोकप्रिय हुई है और वहाँ घर-घर में बोली जाती है । श्री हरिदेव सहतू को उनकी सामाजिक एवं सांस्कृतिक सेवाओं के लिए 1992 में सूरीनाम राष्ट्रपति सम्मान से सम्मानित किया गया है । 

11. प्रो. वू जो किम (दक्षिण कोरिया)

प्रोफेसर वू जो किम ने 1980 में जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से हिंदी में एम.ए. करने के पश्चात 1988 में विश्व-भारती विश्वविद्यालय, शांतिनिकेतन से हिंदी साहित्य में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की । भारतीय भाषाओं और संस्कृति पर प्रोफेसर किम के अनेक लेख प्रकाशित हो चुके हैं । उन्होने भारतीय दर्शनशास्त्र पर भी पुस्तकें लिखी हैं और वे 1980 से अब तक कोरिया के विभिन्न विश्वविद्यालयों में हिंदी के अध्यापन के कार्य से शुरू जुड़ी रही हैं । कोरिया में हिंदी भाषा और साहित्य के प्रचार-प्रसार में डॉ. किम का योगदान महत्वपूर्ण रहा है । प्रो. किम सप्रति सर्वप्रथम "कोरियन-हिन्दी शब्दकोश " की प्रमुख सम्पादक हैं और वे अपभ्रंश साहित्य तथा जैनिज्म शौध पर कार्य कर रही हैं । 

12. श्री धुस्वां सायमि (नेपाल)

श्री धुस्वां सायमि ने 1955 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से प्राचीन भारतीय इतिहास और संस्कृति में एम.ए. किया । श्री सायमि एक अच्छे लेखक हैं और उन्होंने हिंदी और भारतीय संस्कृति पर अनेक लेख और शोध-पत्र लिखे हैं । श्री सायमि अनेक सामाजिक और सांस्कृतिक संगठनों से जुड़े हुए हैं और उन्होंने नेपाल में हिंदी भाषा के विकास में अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान दिया है । श्री सायमि के योगदान के लिए उन्हें अनेक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है । 

13. डॉ. मोहन कांत गौतम (नीदरलैण्ड)

डॉ. गौतम ने भारत में लखनऊ विश्वविद्यालय से 1956 में एम.ए. करने के पश्चात 1977 में लीदन विश्वविद्यालय से समाज विज्ञान, साहित्य और दर्शनशास्त्र में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की । डॉ. गौतम ने विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर अपने शोधपरक पत्र प्रस्तुत किए हैं । उन्होंने भारतीय संस्कृति और दर्शनशास्त्र पर अनेक लेख और पुस्तकें लिखी हैं । उनके लेख समय-समय पर प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं । डॉ. गौतम हिंदी भाषा और साहित्य से जुड़े विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के साथ निकट रूप से जुड़े हुए हैं । उन्होंने विभिन्न देशों में 1958 से अब तक अध्यापन का कार्य किया है । उन्हें अनेक पुरस्कारों से भी सम्मानित किया जा चुका है । 

14. प्रो. ताकेशि फुजिइ (जापान)

प्रो. ताकेशि फुजिइ ने टोक्यो विदेशी अध्ययन विश्वविद्यालय के दक्षिण और पश्चिम एशियाई विभाग में प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं । उन्होंने 1984 में दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी भाषा और साहित्य में एम.ए. किया । वे 1986-87 से अब तक टोक्यो विदेशी अध्ययन विश्वविद्यालय में अध्यापन का कार्य कर रहे हैं । प्रो.फुजिइ अनेक शैक्षणिक संगठनों के साथ निकट रूप से जुड़े हुए हैं । उन्होंने विभिन्न मंचों पर अनेक शोध-पत्र प्रस्तुत किए हैं । विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में उनके अनेक लेख भी प्रस्तुत हो चुके हैं तथा उन्होंने अनेक पुस्तकें भी लिखी हैं । जापान में हिंदी के प्रचार-प्रसार की दिशा में उन्होंने महत्वूपर्ण भूमिका निभाई है । 

15. प्रो. जियांग जिंगकुई (चीन)

प्रो. जियांग जिंगकुई पीकिंग विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग के अध्यक्ष और भारत अनुसंधान केन्द्र के उपनिदेशक हैं । उन्होंने हिन्दी में एम ए, पी एच डी किया है और सप्रति वे हिन्दी के प्रोफेसर हैं । उन्होंने हिन्दी नाटक का इतिहास लिखा है । भारतीय धर्मों का इतिहास भी लिख रहे हैं । वे चीनी-हिन्दी शब्दकोश के उपमुख्य सम्पादक हैं । उन्होंने चीन में भारतीय संस्कृति, सभ्यता और हिन्दी के प्रचार-प्रसार में काफी योगदान दिया है । उनकी मदद और उनके प्रयासों से चीन के कई विश्वविद्यालयों में हिन्दी विभाग खोले गए हैं । उनके द्वारा भारतीय साहित्य और भारतीय संस्कृति से संबंधित सात किताबें लिखी जा चुकी हैं और उनके द्वारा 50 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं ।

16. प्रो. दोनातेल्ला दोल्चीनी (इटली)

प्रो. दोनोतेल्ला दोल्चीनी मिलान विश्वविद्यालय में भारतीय भाषा और भारतीय संस्कृति की प्रोफेसर हैं, उन्होंने 1970 में वेनिस विश्वविद्यालय से हिंदी भाषा और साहित्य में डिग्री प्राप्त की । उसके पश्चात उन्होंने मध्यकालीन भारत में भक्ति और खड़ी बोली हिंदी से संबंधित अनेक लेख लिखें । प्रो. दोल्चीनी विभिन्न सामाजिक और सांस्कृतिक संगठनों से जुड़ी हुई हैं और हिंदी भाषा के विकास के लिए उन्होंने उल्लेखनीय योगदान दिया है । 

17. डॉ. बीरसेन जागासिंह (मारीशस)

डॉ. बीरसेन ने 1979 में विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन से हिंदी में एम.ए. करने के पश्चात् 1983 में विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन से ही डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की । डॉ0 बीरसेन ने अनेक प्रकाशनों का संपादन भी किया तथा वे अनेक शैक्षणिक और सांस्कृतिक संगठनों से भी जुड़े रहे हैं । उन्होंने अनेक शोध पत्रों पर भी कार्य किया है तथा अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर हिंदी भाषा और साहित्य पर अपने शोधपरक आलेख प्रस्तुत किए हैं । डॉ. बीरसेन को समय-समय पर अनेक संस्थानों की ओर से सम्मानित किया गया है और भारतीय भाषाओं और संस्कृति पर उनके अनेक लेख और पुस्तकें विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहे हैं । डॉ. बीरसेन महात्मा गाँधी संस्थान, मोका, मारीशस के क्रिएटिव राइटिंग एण्ड पब्लिकेशन विभाग के अध्यक्ष रहे हैं ।

18. डॉ. पद्मेश गुप्त (यू के)

डॉ. पद्मेश गुप्त जी ने शिक्षा लामार्टीनियर कॉलेज, क्रिश्च्यन कॉलेज एवं लखनऊ यूनिवर्सिटी; इन्स्टीटय़ूट ऑफ रूर बैतराँ डय़ूपाँ, फ्राँस में केमिकल इन्जीनियरिंग का अध्यन तथा कॉस्मेटिक इन्डस्ट्रीज पर शोध कार्य किया । हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग से साहित्यरत्न्, फैडरिक टेलर अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय, अमेरिका से एम बी ए, इंफोरमेश्न टेक्नालॉजी में पी एच डी की उपाधि प्राप्त की । अंग्रेज़ी, हिन्दी, उर्दू एवं फ्रेंच भाषाओं की जानकार । 

डॉ. पद्मेश गुप्त एक सफल संपादक, कवि, कहानीकार होने के साथ-साथ यू.के. हिंदी समिति नामक ब्रिटेन की सर्वाधिक सक्रिय स्वयंसेवी संस्था के अध्यक्ष भी हैं । यह संस्था हिंदी ज्ञान प्रतियोगिता के आयोजन के अलावा पुरवाई नामक त्रैमासिक पत्रिका का प्रकाशन भी पिछले लगभग दस वर्षों से करती आ रही हैं । डॉ. गुप्त प्रवासी टुडे नामक भारत से प्रकाशित पत्रिका के भी संपादक हैं। उन्हें उनके योगदान के लिए विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया जा चुका है । उन्होंने आकृति, सागर का पंछी, दूर बाग में, सौंधी मिट्टी नामक पुस्तकें भी लिखी हैं । ब्रिटेन में हिंदी के प्रचार-प्रसार की दिशा में डॉ. गुप्त ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है । 

19. डॉ. फ्रेंचेस्का ऑर्सिनी (यू के)

डॉ. फ्रेंचेस्का ऑर्सिनी लंदन विश्वविद्यालय के स्कूल आफॅ ओरिएंटल एंड अफ्रीकन स्टडीस (सोआस) में दक्षिण एशियाई भाषा एवं संस्कृति में व्याख्याता हैं और उत्तर भारत के साहित्य (हिन्दी एवं उर्दू) की विशेषज्ञ हैं । उन्होंने वेनिस विश्व विद्यालय से अंडर ग्रेजुएट उपाधित हिन्दी में प्राप्त की और फिर काफी समय भारत में रहीं । लगभग 11 वर्ष तक उन्होंने कैब्रिज विश्वविद्यालय में अध्यापन किया और वर्ष 2006 में ही सोआस में कार्य ग्रहण किया ।

उन्होंने हाल ही में उत्तर भारत का साहित्य, संस्कृति एवं इतिहास: 1450 से 1650 तक विषय पर एक शोघ परियोजना पर कार्य करना आरम्भ किया है । उनकी रुचि के अन्य विषय है दलित लेखन, सम सामयिक हिंदी साहित्य, स्त्री विमर्श आदि । 

20. श्रीमती मगलेना स्लूसारेनिक (पोलैण्ड)

श्रीमती मगलेना स्लूसारेनिक हिंदी भाषा की व्याख्याता हैं । उन्होंने समकालीक हिंदी साहित्य के क्षेत्र में अनेक शोध-पत्र प्रस्तुत किए हैं । उन्होंने मनोहर श्याम जोशी के उपन्यास क्याप पर लेख प्रकाशित किया है । उन्होंने अनेक लेखों का पोलिश भाषा में भी अनुवाद किया है । श्रीमती मगलेना विभिन्न सामाजिक, शैक्षिक संगठनों के साथ जुड़ी हुई हैं । 


भारतीय विद्वान


1. श्री अच्युतानंद मिश्र

श्री अच्युतानंद मिश्र इस समय माखन लाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के कुलपति है । उन्होंने काशी हिंदू विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में एम.ए. की उपाधि प्राप्त की । पत्रकारिता, लेखन और पत्रकारिता शिक्षण के क्षेत्रों में उन्होंने उल्लेखनीय योगदान दिया है । वे अनेक सामाजिक संस्थाओं से भी जुड़ें हुए हैं । उनके सराहनीय कार्यों के लिए उन्हें समय-समय पर विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया गया है। 

2. डॉ. एम. शेषन

डॉ0 एम शेषन ने काशी हिंदू विश्वविद्यालय से हिंदी में एम.ए. करने के पश्चात डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। उन्हें तमिल, संस्कृत और अंग्रेजी भाषाओं का भी अच्छा ज्ञान है। उन्होंने अब तक आठ शोधार्थियों का निर्देशन किया है तथा उन्हें अध्यापन कार्य का एक लम्बा और कुशल अनुभव प्राप्त है। उनकी लगभग 16 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं और उनके अनेक लेख भी समय-समय पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं। उनके योगदान के लिए विभिन्न संस्थाओं द्वारा समय-समय पर सम्मानित किया जा चुका है। 

3. न्यायमूर्ति प्रेम शंकर गुप्त

न्यायमूर्ति प्रेम शंकर गुप्त इलाहाबाद विश्वविद्यालय से विधि स्नातक हैं। न्यायाधीश नियुक्त होने से पूर्व उन्होंने भारत के राज्य और केंद्र सरकारों में अधिवक्ता के रूप में काम किया। 1977 में उन्हें इलाहाबाद उच्च न्यायालय का स्थायी न्यायाधीश नियुक्त किया गया। उन्होंने तभी से न्यायाधीश के रूप में राजभाषा हिंदी में अपने निर्णय देना प्रारंभ किया था और अपने लगभग 15 वर्ष के कार्यकाल में उन्होंने लगभग 4000 निर्णय हिंदी भाषा में दिए। उन्हें उनके सराहनीय कार्यों के लिए अनेक अवसरों पर सम्मानित किया गया। 

4. सुश्री वी एस शांताबाई

सुश्री वी एस शांताबाई हिंदी प्रचार-प्रसार की दिशा में हमेशा से सक्रिय रही हैं और वे विभिन्न स्वयंसेवी संस्थाओं से निकट रूप से जुड़ी रही हैं। वे भारत सरकार के कई मंत्रालयों की हिंदी सलाहकार समिति की सदस्य भी हैं। एक सक्रिय हिंदी प्रचारक के अलावा सुश्री शांताबाई एक अच्छी समाजसेवी भी हैं, जिसके लिए उन्हें अनेक बार विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया जा चुका है।

5. डॉ. माणिक्याम्बा

डॉ. माणिक्याम्बा उस्मानिया विश्व विद्यालय में प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं। वे एक प्रख्यात अनुवादिका, लेखिका और शोधकर्ता हैं। हिंदी के प्रचार-प्रसार के कार्य में वे पिछले चालीस वर्षों से सक्रिय रूप से कार्य कर रही हैं। इस क्षेत्र में उनके योगदान के लिए उन्हें कई बार पुरस्कृत किया जा चुका है। 

6. श्री सूर्यवंशी चौधरी

श्री सूर्यवंशी चौधरी एक लंबे समय से हिंदी प्रचार-प्रसार के कार्य में सक्रिय रूप से जुड़े हुए हैं। वे अनेक स्वयंसेवी हिंदी संस्थाओं के प्रमुख पदों पर रहे हैं। उन्होंने कई पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशन का कार्य आरंभ किया। वे एक अच्छे समाजसेवी भी हैं। 

7. श्री लल्लन प्रसाद व्यास

प्रथम एवं द्धितीय विश्व हिंदी सम्मेलनों में सहायक मंत्री के रूप में विश्व हिंदी सम्मेलनों की परंपरा प्रारंभ करने वाले पुरोधा पुरूष श्री लल्लन प्रसाद व्यास विगत कुछ वर्षों से देश-विदेश में रामायण सम्मेलन आयोजित कर हिंदी भाषा एवं संस्कति का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं। आप सप्रति विश्व हिंदी दर्शन नामक त्रैमासिक पत्रिका के संपादक हैं। आपने हिंदी में 16 पुस्तकें लिखी हैं तथा देश-विदेश में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों और समारोहों में निरंतर भाग लेते रहें हैं। हिंदी भाषा एवं संस्कृत के प्रचार-प्रसार में व्यास जी की भूमिका सराहनीय रही है। 

8. श्री स्वदेश भारती

सप्तक के कवि, उपान्यसकार, स्वदेश भारती की कविताओं ने स्वातंत्रयोत्तर हिंदी कविता को आधुनिक भाव-बोध एवं नयी आयाम दिए हैं। उनके उपन्यासों में भी नए शिल्प, नए तथा प्रवेश की व्यापकता है। उनकी रचनाएं प्रकृति, मानव प्रेम, जीवन अस्तित्व के प्रति आस्था व्यक्त करती हुई विस्तृत दायरे में अपना परिचय कराती है। श्री भारती के अब तक लगभग 45 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है जिनमें कविताएं, उपन्यास, कहानियां आदि प्रमुख हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में उनके लेख भी समय-समय पर प्रकाशित होते रहते हैं। हिंदी भाषा का प्रचार-प्रसार करने की दिशा में श्री भारती का योगदान अत्यंत सराहनीय है। 

9. श्रीमती सुनीता जैन

श्रीमती सुनीता जैन ने स्टेट यूनीवर्सिटी ऑफ न्यूयार्क स्टोनीब्रुक से एम ए तथा यूनिवर्सिटी ऑफ नेब्रास्का से पी एच डी की उपाधि प्राप्त की है। वे आई आई टी दिल्ली में मानविकी तथा सामाजिक विज्ञान विभाग की अध्यक्ष तथा अंग्रेजी की प्रोफेसर रही हैं। अंग्रेजी और हिंदी दोनों भाषाओं में लिखने वाली सुनीता जी ने कहानियों और कवितओं दोनों में अपनी विशिष्ट जगह बनायी है। 

10. श्री बेकल उत्साही

श्री बेकल उत्साही को हिंदी और उर्दू साहित्य, मानवता और सामाजिक कार्यों के क्षेत्र में उनके अमूल्य योगदान के लिए अनेक महत्वपूर्ण पुरस्कारों/सम्मानों से सम्मानित किया गया है, उन्हें 1976 में पद्मश्री से तथा 1955 में राष्ट्रपति के राष्ट्रीय गीत सम्मान से सम्मानित किया गया है। इसके अलावा उन्हें समय-समय पर अनेक सम्मान प्राप्त होते रहे हैं। राज्य सभा के सदस्य भी रहे हैं। हिंदी भाषा के क्षेत्र में उन्होंने अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है। 

11. श्री ओम प्रकाश वाल्मीकि

श्री ओम प्रकाश वाल्मिकी ने हिंदी साहित्य में एम.ए. की उपाधि प्राप्त की है। श्री वाल्मिकी की अब तक 6 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं तथा दो पुस्तकें शीघ्र ही प्रकाशित होने वाली है। उन्होंने विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं का सम्पादन कार्य भी किया है। अभिनय, निर्देशन के क्षेत्र में भी उनका योगदान उल्लेखनीय है। उन्हें अनेक अवसरों पर विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया जा चुका है। उनके लेख भी समय-समय पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते हैं। 

12. डॉ. (श्रीमती) अजीत गुप्ता

डॉ0 (श्रीमती) अजीत गुप्ता जयपुर के राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान में आयुर्वेद की शिक्षा लेने के पश्चात 22 वर्षों तक राजकीय आयुर्वेद महाविद्यालय, उदयपुर में प्रोफेसर एवं चिकित्सक के रूप में अपनी सेवाएं देती रही हैं। वर्ष 1997 में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के पश्चात वे अनेक स्वयंसेवी संस्थानों से जुड़ी और सामाजिक कार्य करते हुए लेखन कार्य में भी लगी रही। उनकी अब तक 4 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उन्होंने अनेक पत्र-पत्रिकाओं का संपादन कार्य किया है और उनकी योगदान के लिए विभिन्न सामाजिक संस्थानों द्वारा उन्हें सम्मानित किया गया है।

13. प्रो. ओम विकास

भारत में सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में हिंदी को लोकप्रिय बनाने में डॉ0 ओम विकास की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। आपने आईआईटी कानपुर से इलैक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में बीटेक और एमटेक की उपाधि प्राप्त करने के बाद टाटा कंसलटेंसी सर्विस में एक वर्ष तक सेवा की और आईआईटी कानुपर से ही कम्प्यूटर विज्ञान में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। डॉ0 ओम विकास 1977 से ही भारत सरकार के इलैक्ट्रानिकी विभाग में कार्यरत रहे। उन्होंने हिंदी में कुछ मौलिक लेखन भी किए हैं जिसमें कम्प्यूटर से बातचीत तथा वैश्वीकरण और हिंदी प्रमुख है। आपको भारत सरकार द्वारा इंदिरा गांधी राजभाषा पुरस्कार, उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा विज्ञान भूषण सम्मान, केंद्रीय हिंदी संस्थान द्वारा आत्माराम पुरस्कार, अक्षरम द्वारा विश्व हिंदी वैज्ञानिक सम्मान एवं अन्य अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में हिंदी को लोकप्रिय बनाने में प्रो0 ओम विकास की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। वे इस समय इंडियन इंस्टीच्यूट आफ इंफोरमेशन टेक्नोलाजी एवं मैनेजमेंट में निदेशक हैं। 

14. श्री अरविंदाक्षन

प्रो. अरविंदाक्षन वर्तमान में साइंस एवं तकनीकी विश्वविद्यालय, कोची के हिंदी विभागाध्यक्ष एवं डीन कला संकाय है। प्रो. अरविंदाक्षन की विशेषज्ञता हिंदी साहित्य, हिंदी भाषा, अनुवाद एवं आलोचना के क्षेत्र में विख्यात है। दक्षिण भारत में हिंदी के प्रचार-प्रसार में इनका सम्मानजनक योगदान रहा है। प्रो. अरविंदाक्षन के शोध पत्र भारत की अनेकों पत्र-पत्रिकाओं में छप रहे है। इनकी साहित्यिक सेवा के लिए कई साहित्यिक संस्थाओं ने सम्मानित किया है। 

15. डॉ. मोहन धारिया

डॉ मोहन धारिया ने अपने जीवन के शुरूआती वर्षों से ही क्रंतिकारी रास्ता अपनाया और 1942 में स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े, जिसके लिए उन्हें अनेक बार जेल जाना पड़ा। उन्होंने युवा आंदोलन शुरू किया तथा विभिन्न ट्रेड यूनियनों में भी उनकी सक्रिय भागीदारी रही। डॉ धारिया राज्य सभा तथा लोक सभा दोनों के सदस्य रहे हैं। डॉ धारिया कई बार केंद्र सरकार में मंत्री भी रहे हैं। उन्होंने सामाजिक न्याय और पर्यावरण के क्षेत्र में अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान दिया है। डॉ धारिया अनेक सामाजिक, शैक्षिक और सहकारी संगठनों से जुड़े रहे हैं। वे अच्छे लेखक भी हैं और उन्होंने कई पुस्तकें लिखी हैं। उन्हें राष्ट्रीय एवं राज्य स्तर पर अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है।

16. प्रो. कृष्णदत्त पालीवाल

प्रो. कृष्ण्दत्त पालीवार इस समय दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं तथा वे विगत में विभागाध्यक्ष भी रह चुक हैं। प्रोफेसर पालीवाल जापान के टोक्यो यूनिवर्सिटी और फारेन स्टडीज में विजीटिंग प्रोफेसर रहे हैं। वे पत्रिकारिता के क्षेत्र में भी निरंतर सक्रिय रहे हैं। उनके लगभग 300 लेख तथा 400 पुस्तक समीक्षाएं प्रकाशित हो चुकी हैं। साथ ही उनकी अब तक 29 पुस्तके भी प्रकाशित हो चुकी हैं। उन्होंने कोर्स कार्य के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय कार्य किया है। उनके सराहनीय योगदान के लिए अनेक संस्थानों के द्वारा उन्हें सम्मानित किया गया है। 

17. प्रो. निर्मला जैन

प्रो. निर्माला जैन को दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य का एक लम्बा अनुभव है। उन्होंने लगभग 80 शोधार्थियों को उनके शोध कार्य में निर्देशन दिया है। विदेशी विश्वविद्यालयों के निमंत्रण पर भी उन्होंने विदेशों में अनेक सेमिनारों/संगोष्ठियों में भाग लिया है। उनके सराहनीय कार्यों के लिए उन्हें अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया जा चुका है। वे समय-समय पर भारत सरकार के विभिन्न मंत्रालयो की हिंदी सलाहकार समिति की सदस्य भी रह चुकी हैं। 

18. सुश्री महाश्वेता देवी

सुश्री महाश्वेता देवी ने भारत में आदिवासियों के कल्याण कार्यक्रमों के क्षेत्र में अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान दिया है। कहानी, उपन्यास, बाल साहित्य, नाटक विधाओं में उनकी सौ से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हैं। उन्हें देश-विदेश में अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। 

19. डॉ. केदार नाथ सिंह

वरिष्ठ कवि एवं हिंदी आलोचक डॉ0 केदार नाथ सिंह अपने आस-पास के परिवेश से प्रेरणा प्राप्त कर साहित्य सृजन किया है। आपकी काव्य संवेदना का विस्तार गांवों से लेकर नगर तक फैला हुआ है। आपकी कविता में युक्त शब्द विशेष और गम्भीर रखते हैं और आपका कलात्मक कौशल बार-बार अपने को नया स्वरूप प्रदान करता है तथा सौंदर्य की नयी भाव भूमि तैयार करता है। डॉ0 सिंह अमरीका, रूस, ब्रिटेन, काजिकस्तान आदि देशों में काव्य पाठ किया है। उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार, मैथिली शरण गुप्त सम्मान, कुमारा आसान पुरूस्कार और जीवन-भारती सम्मान से पुरस्कृत किया जा चुका है। आपने अंग्रेजी, स्पेनिश, रूसी, जर्मन, हंगेरियन भाषाओं की कविता का अनुवाद किया है। आपकी रचनाओं में अकाल में सारस, आधुनिक हिंदी कविता में विधान, टार्च टायर और साईकिल विशेष रूप से उल्लेखनीय है। डॉ0 केदार नाथ सिंह ने जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय सहित भारत के अनेक विश्वविश्वालय में अध्यापन का कार्य किया है और इस समय जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के भाषा केंद्र में प्रोफेसर एमिरिटस हैं

20. डॉ. जगदीश पीयूष

डॉ0 जगदीश पीयूष एक अच्छे लेखक और समाजसेवी हैं। वे अवधी अकादमी, सजृन पीठ, प्रियदर्शिनी महिला पीठ आदि जैसे विभिन्न संगठनों के अध्यक्ष हैं। उनकी अब तक चार पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं तथा दो पुस्तकें शीघ्र ही प्रकाशित होने वाली है। वे भारत सरकार के विभिन्न मंत्रालयों की हिंदी सलाहकार समिति की सदस्य भी है। उन्होंने लोक साहित्य संबंधी कार्यों में अपना महत्वूपर्ण योगदान दिया है। डॉ. पीयूष को विभिन्न संस्थानों द्वारा सम्मानित किया जा चुका है। उन्होंने विभिन्न विषयों पर अनेक ग्रंथों का संपादन कार्य भी किया है। 

 


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